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वो सब जो अनकहा रह जाता है। वो सब जो दब जाता है दिल में गहरे कहीं। वो सब जो हम कहना चाहते हैं पर कह नहीं पाते। य़े किताब बस एक नज्मों-कविताओं का संग्रह नहीं है, एक सपना है जो 17 साल के एक लड़के ने 20 साल पहले देखा था। चाहे आप कॉलेज में पढ़ रहे हैं, नौकरी कर रहे हैं, या अपनी जवानी के दिनों को याद कर रहे हैं, इस संकलन में आपको अपने लिए कुछ न कुछ जरूर मिलेगा।

Produktbeschreibung
वो सब जो अनकहा रह जाता है। वो सब जो दब जाता है दिल में गहरे कहीं। वो सब जो हम कहना चाहते हैं पर कह नहीं पाते। य़े किताब बस एक नज्मों-कविताओं का संग्रह नहीं है, एक सपना है जो 17 साल के एक लड़के ने 20 साल पहले देखा था। चाहे आप कॉलेज में पढ़ रहे हैं, नौकरी कर रहे हैं, या अपनी जवानी के दिनों को याद कर रहे हैं, इस संकलन में आपको अपने लिए कुछ न कुछ जरूर मिलेगा।
Autorenporträt
अरुण कुशवाहा, देहरादून के रहने वाले, साहित्य से गहरा प्रेम रखने वाले कवि हैं। 1987 में जन्मे अरुण ने उर्दू और हिंदी की भावपूर्ण कविताओं को देवनागरी लिपि में पिरोया है। यह उनकी पहली प्रकाशित किताब है, जिसे प्रकाशित कर पाना उनके 20 साल पुराने सपने को साकार करना है। उनकी लेखनी में गहरी भावनाएं हैं, जो हर पाठक के दिल को छू जाती हैं। इस संग्रह के साथ अरुण अपने दिल की बातें और शब्दों की जादूगरी पहली बार आपके सामने ला रहे हैं।